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उपन्यास

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पंजा
2026

प्रकाशक - वाणी प्रकाशन

अपने आसपास की बहुत सारी घटनाओं को मनुष्य नजरअंदाज कर देता है। ऐसी रोज़मर्रा की गतिविधियों में भी कुछ अलग घटित हो रहा है, यह कुत्ते की नज़रों से नहीं बचता। धरती के एक भाग की कहानी ऐसे जीव के माध्यम से कही जाए, जिसके पास मानव के समान भाषा नहीं है, लेकिन उसका जीवन अनुभव बहुत गहरा है। उसने बहुत कुछ देखा, सुना, समझा है। ऐसा प्राणी जब अपनी कथा कहेगा तब कौन-कौनसे सच सामने आयेंगे? 'पंजा' उपन्यास 'बंधु' की ऐसी ही असाधारण जीवन यात्रा की कहानी है। भारतीय नस्ल के कुत्ते के जन्म से शुरू होती उपन्यास नायक 'बंधु' की कथा अनेक अप्रत्याशित राहों से हो कर आगे बढ़ती है। बचपन में गोद लिए जाने से लेकर भारतीय सेना में शामिल होने तक बंधु का जीवन बहादुरी, कर्तव्यनिष्ठा, साहस और निष्ठा की कसौटियों से बार-बार गुजरता है। अपने पहले 'परिवार' और हैंडलर के साथ उसके रिश्ते उपन्यास में भावपूर्ण अध्याय जोड़ते हैं। सेना में अपनी सेवाएं देकर बंधु का सेवानिवृत्त होना और एक राजनेता के घर पहुँचना उसके जीवन में नया मोड लेकर आता है। नये परिवेश में सत्ता, विशेषाधिकार और संवेदना के बीच धुँधली होती मानवीय भावनाओं की सीमाएं बंधु के जीवन में नयी कथा को जन्म देती हैं। सैनिकों के साथ आत्मीय संबंध से लेकर हिंसा और अन्याय के इर्द-गिर्द पसरे मौन तक 'बंधु' की कथा ऐसी असहज करने वाली ख़ामोशियों से होकर आगे बढ़ती है जो मानव मस्तिष्क के समान ही जटिल है। वह कुछ ऐसे क्षणों का साक्षी भी बनता है जिसकी गवाही के लिए शब्द कम पड़ जाएं। 'बंधु' की गवाही के बगैर शायद वह घटना दफ़्न हो जाती जिसका वह अनपेक्षित साक्षी बन जाता है। भारतीय नस्ल के कुत्ते की दृष्टिकोण से वंदना यादव का यह उपन्यास एक प्राणी को गोद लेने, उसकी नैतिक जिम्मेदारी उठाने और मानवीय प्रकृति के अंतर्विरोध की पड़ताल करता है। 'पंजा' उपन्यास मनुष्य और कुत्ते के रिश्ते के संवेदनशील चित्रण के साथ सामाजिक और यथार्थ पर पैनी नज़र भी डालता है जो हमारे जीवन को आकार देते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कभी-कभी सबसे गहरी सच्चाई उन जीवों की कहानियों में छिपी होती है, जिन्हें सुनना या जिनकी भाषा समझने का हमने प्रयास ही नहीं किया।

शुद्धि
2022

प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ

उपन्यास की शुरुआत परिवार के मुखिया शेर सिंह की मृत्यु से होती है। पंडित जी के कहे अनुसार मृत व्यक्ति की आत्मा, शुद्धि तक घर में रहने वाली है। बस यहीं से शुरू होता है उपन्यास का ताना-बाना... जहाँ मृतक की पत्नी अपने पति की आत्मा के ज़रिये घर-परिवार के लोगों के बदलते व्यवहार और यहाँ तक कि अपनी औलाद के असली चेहरों को भी देख पाती है। पहली मौत के कुछ दिनों के भीतर ही बुजुर्ग के भाई की मौत से हालात इस तरह बदलते हैं कि दोनों भाईयों के बेटों और शादीशुदा पोतों के परिवार भी एक छत के नीचे, एकसाथ रहने को मजबूर हो जाते हैं। दोनों बुजुर्ग भाईयों की विवाहित बेटियाँ और नातिन भी दुःख जताने पहुँचती हैं। इसी बीच हालात तब और पेचीदा हो जाते हैं जब घर के सबसे महत्वपूर्ण बेटे की पत्नी और उसकी लिव-इन-पार्टनर भी एकसाथ गाँव में पहुँच जाती हैं। वे सभी रिश्तेदार जो कभी एकसाथ रहने को तरसते थे इस समय साथ रहते हुए उनका रिश्तों से मोहभंग, घर के बड़े बेटे-बहू का बदलता व्यवहार, ज़मीन-जायदाद और पैसे के लालच के बीच युवाओं की सोच के साथ करवट लेते रिश्तों के कारण घर में स्थितियाँ लगातार बदल रही हैं। राजस्थान के सीमावर्ती शहर बीकानेर से सटे गाँव उदयरामसर में वर्षों के बिछोह के बाद मिल रही नयी पुरानी पीढ़ियाँ, दुःख के समय को भी हँसते-रोते हुए एकसाथ बिताने का सुख उठाती हैं। कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा साथ रहने की इच्छा सबके भीतर होती है कि उसी समय स्थिति अचानक पलट जाती है। नये हालात में तेरह के बजाय साथ रहने वाले दिनों की संख्या लगातार बारी-बारी से बढ़ती रहती है।

कितने मोर्चे
2018

प्रकाशक - अद्विक पब्लिकेशन

सैनिक के बोर्डर पर पोस्टिंग जाते ही उसके परिवार को सपरेटेड फैमिली क्वार्टर्स में शिफ्ट कर दिया जाता है। जब से सेना का गठन हुआ है, यह व्यवस्था चली आ रही है। कैंटोनमेंट के भीतर इस अलग तरह की दुनिया में कुसुम अपने सैनिक पति की पोस्टिंग के बाद रहने के लिए पहुंचती है। यहाँ सब ओर उसके जैसी महिलाएं अपने बच्चों के साथ रह रही हैं। चौधरी विहार, यानी सपरेटेड फैमिली क्वार्टर्स। ऐसे घर जो सैनिकों के नाम पर अलॉट तो किए जाते हैं मगर वहाँ सैनिक नहीं रहते। दरअसल कहा जाए कि यहाँ सैनिकों के जीवन की असली "हीरो" रहती हैं, तब सही होगा। यहाँ रहने वाली महिलाएं 'सिंगल मदर' की भुमिका में अनेक मोर्चों पर बिल्कुल अकेले संघर्षरत हैं। आबादी के बीच रहते हुए, अकेलेपन से जूझती सैनिक पत्नियों के जीवन पर हिन्दी साहित्य में पहली बार इस विषय की उपस्थिती दर्ज करवाता है, वन्दना यादव द्वारा रचित "कितने मोर्च" उपन्यास। समाज में रहने वाली, समाज से कटी हुई इन अद्भुत जीवट वाली महिलाओं के जीवन संघर्षों, देश के लिए दिए गए त्याग और बलिदान का लेखा-जोखा है 'कितने मोर्च' उपन्यास।

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